कवर्धा: शिक्षा विभाग में पिछले तीन वर्षों (अक्टूबर 2022 – अक्टूबर 2025) के दौरान कोषालय से कुल ₹2,18,04,87,344 की राशि निकाले जाने के बावजूद उसका कोई प्रमाणित लेखा-जोखा उपलब्ध नहीं है। यह खुलासा जिला शिक्षा अधिकारी एफ.आर. वर्मा द्वारा गठित ऑडिट टीम की जांच में सामने आया। ऑडिट के दौरान कई गंभीर वित्तीय कमियां उजागर हुई हैं, जिनमें कैश बुक का अधूरा होना और कई महत्वपूर्ण वाउचर एवं व्यय से संबंधित अभिलेखों का गायब होना शामिल है।आरटीआई के माध्यम से प्राप्त जानकारी के अनुसार, इस अवधि में विशेष रूप से एरियर्स भुगतान से जुड़े मामलों में अनियमितताएं हुई हैं और कई फाइलें लंबित हैं, जिनकी स्थिति संदिग्ध बताई जा रही है। इस तरह की अनियमितताओं ने सरकारी धन के दुरुपयोग की आशंका और बढ़ा दी है।इस मामले ने शिक्षा विभाग की कार्यशैली और प्रशासनिक मॉनिटरिंग सिस्टम की कमजोरी को उजागर किया है। यह सवाल उठता है कि जिला स्तर पर अधिकारियों की निगरानी के बावजूद इतनी बड़ी राशि बिना स्पष्ट रिकॉर्ड के कैसे निकाली गई।तत्कालीन बीईओ दुबे जी और उनके पूर्वाधिकारी संजय जायलवाल, जिनका कार्यकाल इस अवधि में शामिल है, मामले के घेरे में हैं। ऑडिट के दौरान पाए गए वित्तीय कमियों के आधार पर संबंधित अधिकारियों से स्पष्टिकरण मांगा जाएगा और आगे की कारवाई की संभावना बनी हुई है।मामला उजागर होने के बाद शिक्षा विभाग में हलचल तेज हो गई है और उच्च स्तरीय जांच की संभावना पर सबकी निगाहें टिकी हुई हैं। यह घटना विभागीय पारदर्शिता और सरकारी धन के प्रबंधन में सुधार की आवश्यकता को भी दर्शाती है।
कवर्धा: शिक्षा विभाग में पिछले तीन वर्षों (अक्टूबर 2022 – अक्टूबर 2025) के दौरान कोषालय से कुल ₹2,18,04,87,344 की राशि निकाले जाने के बावजूद उसका कोई प्रमाणित लेखा-जोखा उपलब्ध नहीं है। यह खुलासा जिला शिक्षा अधिकारी एफ.आर. वर्मा द्वारा गठित ऑडिट टीम की जांच में सामने आया। ऑडिट के दौरान कई गंभीर वित्तीय कमियां उजागर हुई हैं, जिनमें कैश बुक का अधूरा होना और कई महत्वपूर्ण वाउचर एवं व्यय से संबंधित अभिलेखों का गायब होना शामिल है।
आरटीआई के माध्यम से प्राप्त जानकारी के अनुसार, इस अवधि में विशेष रूप से एरियर्स भुगतान से जुड़े मामलों में अनियमितताएं हुई हैं और कई फाइलें लंबित हैं, जिनकी स्थिति संदिग्ध बताई जा रही है। इस तरह की अनियमितताओं ने सरकारी धन के दुरुपयोग की आशंका और बढ़ा दी है।
इस मामले ने शिक्षा विभाग की कार्यशैली और प्रशासनिक मॉनिटरिंग सिस्टम की कमजोरी को उजागर किया है। यह सवाल उठता है कि जिला स्तर पर अधिकारियों की निगरानी के बावजूद इतनी बड़ी राशि बिना स्पष्ट रिकॉर्ड के कैसे निकाली गई।
तत्कालीन बीईओ दुबे जी और उनके पूर्वाधिकारी संजय जायलवाल, जिनका कार्यकाल इस अवधि में शामिल है, मामले के घेरे में हैं। ऑडिट के दौरान पाए गए वित्तीय कमियों के आधार पर संबंधित अधिकारियों से स्पष्टिकरण मांगा जाएगा और आगे की कारवाई की संभावना बनी हुई है।
मामला उजागर होने के बाद शिक्षा विभाग में हलचल तेज हो गई है और उच्च स्तरीय जांच की संभावना पर सबकी निगाहें टिकी हुई हैं। यह घटना विभागीय पारदर्शिता और सरकारी धन के प्रबंधन में सुधार की आवश्यकता को भी दर्शाती है।
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